§1ـ बादल (सानेट)

छाए हुए हैं चार तरफ़ पारा‐हा-ए- अब्र
आग़ोश में लिए हुए दुनिया-ए आब‐ओ‐रंग
मेरे लिए है उन की गरज में सरोद-ए चंग
पैग़ाम-ए इंबिसात है मुझ को सदा-ए अब्र
उट्ठी है हलके हलके सरों में नवा-ए अब्र
और क़त्र‐हा-ए- आब बजाते हैं जल्तरंग
गहराइयों में रूह की जागी है हर उमंग
दिल में उतर रहे हैं मिरे नग़्मा‐हा-ए- अब्र
मुद््दत से लुट चुके थे तमन्ना के बार‐ओ‐बर्ग
छाया हुआ था रूह पे गोया सुकूत-ए मर्ग
छूड़ा है आज ज़ीस्त को ख़्वाब-ए जमूद ने
उन बादलों से ताज़ा हुई है हयात फिर
मेरे लिये जवान है ये काइनात फिर
शादाब कर दिया है दिल उन के सरोद ने!

§2. एक दिन—लारिंस बाग़ में (एक कैफ़ियत) arrow_right

I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry