§16ـ वो हर्फ़-ए तंहा (जिसे तमन्ना-ए वस्ल-ए माना)

हमारे आज़ा जो आस्माँ की तरफ़ दुआ के लिये उठे हैं,
(तुम आस्माँ की तरफ़ न देखो!)
मक़ाम-ए नाज़ुक पे ज़र्ब-ए कारी से जाँ बचाने का है वसीला
कि अपनी महरूमियों से छुपने का एक हीला?
बुज़ुर्ग‐ओ‐बर-तर ख़ुदा कभी तो (बिहिश्त बर-हक़,)
हमें ख़ुदा से नजात देगा
कि हम हैं इस सर-ज़मीं पे जैसे वो हर्फ़-ए तंहा,
(मगर वो ऐसा जहाँ न होगा) ख़मोश‐ओ‐गोया,
जो आर्ज़ू-ए विसाल-ए मानी में जी रहा हो
जो हर्फ़‐ओ‐मानी की यक-दिली को तरस गया हो!

हमें मर्री के ख़्वाब दे दो
(कि सब को बख़शें बक़द्र-ए ज़ौक़-ए निगह तबस्सुम)
हमें मर्री की रूह का इज़्तिराब दे दो
(जहाँ गुनाहों के हौसले से मिले तक़द््दुस के दुख का मरहम)
कि उस की बे-नूर‐ओ‐तार आंखें
दिरून-ए आदम की तीरा रातों
को छेदती थीं
उसी जहाँ में फ़िराक़-ए जाँ-काह-ए हर्फ़‐ओ‐मानी
को देखती थीं
बिहिश्त उस के लिये वो मासूम सादा लौहों की आफ़ियत था
जहाँ वो नंगे बदन पे जाबिर के ताज़ियानों से बच-के
राह-ए फ़रार पाएँ
वो कफ़्श-ए पा था, कि जिस से ग़ुर्बत की रेग-ए हज़याँ
से रोज़-ए फ़ुर्सत क़रार पाएँ
कि सुल्ब-ए आदम की, रेहम-ए हव्वा की उज़्लतों में
निहायत-ए इंतिज़ार पाएँ!

(बिहिश्त सिफ़्र-ए अज़ीम, लेकिन हमें वो गुम-गश्ता हंदसे हैं
बग़ैर जिन के कोई मसावात क्या बनेगी
विसाल-ए मानी से हर्फ़ की बात क्या बनेगी?)
हम इस ज़मीं पर अज़ल से पीराना सर हैं, माना
मगर अभी तक हैं दिल तवाना
और अपनी झ़ूलीदा कारियों के तुफ़ैल दाना
हमें मर्री के ख़्वाब दे दो
(बिहिश्त में भी नशात, यक-रंग हो तो, ग़म है
हो एक सा जाम-ए शहद सब के लिये तो सम है)
कि हम अभी तक हैं इस जहाँ में वो हर्फ़-ए तंहा
(बिहिश्त रख लो, हमें ख़ुद अपना जवाब दे दो!)
जिसे तमन्ना-ए वस्ल-ए माना...

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I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry