§18ـ दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल

नग़्मा दर जाँ, रक़्स बर पा, ख़ंदा बर लब
दिल, तमन्नाओं के बे-पायाँ अलाओ के क़रीब!

दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल
रेग के दिलशाद शहरी, रेग तू
और रेग ही तेरी तलब
रेग की नकहत तिरी पैकर में, तेरी जाँ में है!

रेग सुब्ह-ए ईद के मानिंद ज़र-ताब‐ओ‐जलील,
रेग सदयों का जमाल,
जश्न-ए आदम पर बिछड़-कर मिलने-वालों का विसाल,
शौक़ के लम्हात के मानिंद आज़ाद‐ओ‐अज़ीम!

रेग नग़्मा-ज़न
कि ज़र्रे रेग-ज़ारों की वो पा-ज़ेब-ए क़दीम
जिस पे पड़ सकता नहीं दस्त-ए लईम,
रेग-ए सहरा ज़र-गरी की रेग की लहरों से दूर
चश्मा-ए मक्र‐ओ‐रिया शहरों से दूर!

रेग शब बेदार है, सुनती है हर जाबिर की चाप
रेग शब बेदार है, निगराँ है मानिंद-ए नक़ीब
देखती है साया-ए आमिर की चाप
रेग हर अययार, ग़ारत-गर की मौत
रेग इस्तिबदाद के तुग़याँ के शोर‐ओ‐शर की मौत
रेग जब उठती है, उड़ जाती है हर फ़ातिह की नींद
रेग के नेज़ों से ज़ख़्मी, सब शहंशाहों के ख़्वाब!

(रेग, ऐ सहरा की रेग
मुझ को अपनी जागते ज़र्रों के ख़्वाबों की
नई ताबीर दे!)

रेग के ज़र्रो, उभरती सुब्ह तुम,
आओ सहरा की हदों तक आ गया रोज़-ए तरब
दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल,
आ चूम रेग!
है ख़यालों के परीज़ादों से भी मासूम रेग!

रेग रक़साँ, माह‐ओ‐साल-ए नूर तक रक़साँ रहे
उस का अब्रेशम मलाइम, नर्म-ख़ू, ख़ंदाँ रहे!

दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल
ये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ
राह-गुम-कर्दों की मश्अल, उस के लब पर "आओ! आओ!"
तेरे माज़ी के ख़ज़िफ़ रेज़ों से जागी है ये आग
आग की क़िर्मिज़ ज़बाँ पर इंबिसात-ए नौ के राग
दिल, मिरे सहरा-नवर्द-ए पीर दिल,
सर-गरानी की शब-ए रफ़्ता से जाग!
कुछ शरर आग़ोश-ए सर्सर में हैं गुम,
और कुछ ज़ीना ब ज़ीना शोलों के मीनार पर चड़ते हुए
और कुछ तह में अलाओ की अभी,
मुज़्तरिब, लेकिन मुज़ब्ज़ब तिफ़्ल-ए कमसिन की तरह!
आग ज़ीना, आग रंगों का ख़ज़ीना
आग उन लज़्ज़ात का सरचश्मा है
जिस से लेता है ग़ज़ा उशशाक़ के दिल का तपाक!
चोब-ए ख़ुश्क अंगोर, उस की मै है आग
सर्सराती है रगों में ईद के दिन की तरह!

आग काहिन, याद से उत्री हुई सदयों की ये अफ़्साना-ख़्वाँ
आने-वाले क़र्नहा की दास्तानें लब पे हैं
दिल, मिरा सहरा-नवर्द-ए पीर दिल सुन-कर जवाँ!

आग आज़ादी का, दिल-शादी का नाम
आग पैदाइश का, अफ़्ज़ाइश का नाम
आग के फूलों में नसरीं, यास्मिन, सुम्बुल, शक़ीक़‐ओ‐नस्तरन
आग आराइश का, ज़ेबाइश का नाम
आग वो तक़दीस, धुल जाते हैं जिस से सब गुनाह
आग इंसानों की पहली सांस के मानिंद इक ऐसा करम
उम्र का इक तूल भी जिस का नहीं काफ़ी जवाब!

ये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ गर न हो
इस लक़‐ओ‐दक़ में निकल आएँ कहीं से भेड़िये
इस अलाओ को सदा रोशन रखो!
(रेग-ए सहरा को बशारत हो कि ज़िंदा है अलाओ,
भेड़ियों की चाप तक आती नहीं!)

आग से सहरा का रिश्ता है क़दीम
आग से सहरा के टेड़े, रेंगने-वाले,
गिरह-आलूद, झ़ूलीदा दरख़्त
जागते हैं नग़्मा दर जाँ, रक़्स बर-पा, ख़ंदा बर-लब
और मना लेते हैं तंहाई में जश्न-ए माहताब
उन की शाख़ें ग़ैर मरई तब्ल की आवाज़ पर देती हैं ताल
बेख़‐ओ‐बुन से आने लगती है ख़ुदावंदी जलाजिल की सदा!

आग से सहरा का रिश्ता है क़दीम
रहरौओं, सहरा-नवर्दों के लिए है रहनुमा
कारवानों का सहारा भी है आग
और सहराओं की तंहाई को हम करती है आग!

आग के चारों तरफ़ पशमीना‐ओ‐दस्तार में लिपटे हुए
अफ़्साना-गो
जैसे गिर्द-ए चस्म मिझ़गाँ का हुजूम;
उन के हैरत-नाक, दिलकश तज्रिबों से
जब दमक उठती है रेत,
ज़र्रा ज़र्रा बजने लगता है मिसाल-ए साज़-ए जाँ
गोश बर आवाज़ रहते हैं दरख़्त
और हंस देते हैं अपनी आरिफ़ाना बे-नियाज़ी से कभी!

ये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ गर न हो
रेग अपनी ख़ल्वत-ए बे-नूर‐ओ‐ख़ुद-बीं में रहे
अपनी यकताई की तहसीं में रहे
इस अलाओ को सदा रोशन रखो!

ये तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ गर न हो
एशिया, अफ़्रीक़ा पहनाई का नाम
(बे-कार पहनाई का नाम)
यूरोप और अम्रीका दाराई का नाम
(तकरार-ए दाराई का नाम!)

मेरा दिल, सहरा नवर्द-ए पीर दिल
जाग उठा है, मशरिक़‐ओ‐मग़्रिब की ऐसी यक-दिली
के कारवानों का नया रोया लिए:
यक-दिली ऐसी कि होगी फ़हम-ए इंसाँ से वरा
यक-दिली ऐसी कि हम सब कह उठें
"इस क़दर उज्लत न कर
इझ़्दिहाम-ए गुल न बन!"
कह उठें हम:
"तू ग़म-ए कुल तो न थी
अब लज़्ज़त-ए कुल भी न बन
रोज़-ए आसाइश की बे-दर्दी न बन
यक-दिली बन, ऐसा सुन्नाटा न बन,
जिस में ताबिस्ताँ की दो-पहरों की
बे-हासिल कसालत के सिवा कुछ भी न हो!"

इस "जफ़ा-गर" यक-दिली के कारवां यूँ आएंगे
दस्त-ए जादू-गर से जैसे फूट निकले हों तिलिस्म,
इश्क़-ए हासिल-ख़ेज़ से, या ज़ोर-ए पैदाई से जैसे ना-गहाँ
खुल गए हों मशरिक़‐ओ‐मग़्रिब के जिस्म,
—जिस्म, सदयों के अक़ीम!

कारवां फ़र्ख़ुंदा पै, और उन का बार
कीसा कीसा तख़्त-ए जम‐ओ‐ताज-ए कै
कूज़ा कूज़ा फ़र्द की सत्वत की मै
जामा जामा रोज़‐ओ‐शब मेहनत का ख़ै
नग़्मा नग़्मा हुर्रियत की गर्म लै!

सालिको, फ़ीरोज़-बख़्तो, आने-वाले क़ाफ़िलो
शहर से लौटोगे तुम तो पाओगे
रेत की सरहद पे जो रूह-ए अबद ख़्वाबीदा थी
जाग उठी है "शिक्वा‐हा-ए- नै" से वो
रेत की तह में जो शर्मीली सहर रोईदा थी
जाग उठी है हुर्रियत की लै से वो!

इत्नी दोशीज़ा थी, इत्नी मर्द ना-दीदा थी सुब्ह
पूछ सकते थे न उस की उम्र हम!
दर्द से हंसती न थी,
ज़र्रों की रानाई पे भी हंसती न थी,
एक महजूबाना बे-ख़बरी में हंस देती थी सुब्ह!
अब मनाती है वो सहरा का जलाल
जैसे अज़्ज़‐ओ‐जल के पाओं की यही मेहराब हो!
ज़ेर-ए मेहराब आ गई हो उस को बेदारी की रात
ख़ुद जनाब-ए अज़्ज़‐ओ‐जल से जैसे उम्मीद-ए ज़िफ़ाफ़
(सारे ना-कर्दा गुनाह उस के मआफ़!)

सुब्ह-ए सहरा, शाद-बाद!
ऐ अरूस-ए अज़्ज़‐ओ‐जल, फ़र्ख़ुंदा रू, ताबिंदा ख़ू
तू इक ऐसे हुज्रा-ए शब से निकल-कर आई है
दस्त-ए क़ातिल ने बहाया था जहाँ हर सेज पर
सैंकड़ों तारों का रुख़्शंदा लहू, फूलों के पास!
सुब्ह-ए सहरा, सर मिरे ज़ानू पे रख-कर दास्ताँ
उन तमन्ना के शहीदों की न कह
उन की नीमा-रस उमंगों, आर्ज़ुओं की न कह
जिन से मिलने का कोई इम्काँ नहीं
शहद तेरा जिन को नोश-ए जाँ नहीं!
आज भी कुछ दूर, इस सहरा के पार
देव की दीवार के नीचे नसीम
रोज़‐ओ‐शब चलती है मुबहम ख़ौफ़ से सहमी हुई
जिस तरह शहरों की राहों पर यतीम
नग़्मा बर-लब ता कि उन की जाँ का सुन्नाटा हो दूर!

आज भी इस रेग के ज़र्रों में हैं
ऐसे ज़र्रे, आप ही अपने ग़नीम
आज भी इस आग के शोलों में हैं
वो शरर जो इस की तह में पर-बरीदा रह गए
मिस्ल-ए हर्फ़-ए ना-शुनीदा रह गए!
सुब्ह-ए सहरा, ऐ अरूस-ए अज़्ज़‐ओ‐जल
आ कि उन की दास्ताँ दुहराएँ हम
उन की इज़्ज़त, उन की अज़्मत गाएँ हम

सुब्ह, रेत और आग, हम सब का जलाल!
यक-दिली के कारवां उन का जमाल
आओ!
इस तहलील के हलक़े में हम मिल जाएँ
आओ!
शाद-बाद अपनी तमन्नाओं का बे-पायाँ अलाओ!

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I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry