§23ـ ये ख़ला पुर न हुआ

ज़ेहन ख़ाली है
ख़ला नूर से, या नग़मे से
या नकहत-ए गुम-राह से भी
पुर न हुआ
ज़ेहन ख़ाली ही रहा
ये ख़ला हर्फ़-ए तसल्ली से,
तबस्सुम से,
किसी आह से भी पुर न हुआ
इक नफ़ी लर्ज़िश-ए पैहम में सही
जहद-ए बे-कार के मातम में सही
हम जो ना-रस भी हैं, ग़म दीदा भी हैं
इस ख़ला को
(इसी देहलीज़ पे सोए हुए
सर-मस्त गदा के मानिंद)
किसी मीनार की तस्वीर से,
या रंग की झंकार से
या ख़्वाबों की ख़ुशबुओं से
पुर क्यों न करें?
कि अजल हम से बहुत दूर
बहुत दूर रहे?
नहीं, हम जानते हैं
हम जो ना-रस भी हैं, ग़म-दीदा भी हैं
जानते हैं कि ख़ला है वो जिसे मौत नहीं
किस लिये नूर से, या नग़मे से
या हर्फ़-ए तसल्ली से इसे "जिस्म" बनाएँ
और फिर मौत की वा-रफ़्ता पज़ीराई करें?
नए हंगामों की तजलील का दर बाज़ करें
सुब्ह-ए तकमील का आग़ाज़ करें?

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§24. तलब के तले arrow_right

I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry