§25ـ गुमाँ का मुम्किन—जो तू है मैं हूँ!

करीम सूरज,
जो ठंडे पत्थर को अपनी गोलाई
दे रहा है
जो अपनी हमवारी दे रहा है—
(वो ठंडा पत्थर जो मेरे मानिंद
भूरे सबज़ों में
दौर-ए रेग‐ओ‐हवा की यादों में लौटता है)
जो बहते पानी को अपनी दरया-दिली की
सरशारी दे रहा है
—वही मुझे जानता नहीं है
मगर मुझी को ये वहम शायद
कि आप अपना सुबूत अपना जवाब हूँ मैं!
मुझे वो पहचानता नहीं है
कि मेरी धीमी सदा
ज़माने की झील के दूसरे किनारे
से आ रही है

ये झील वो है कि जिस के ऊपर
हज़ारों इंसाँ
उफ़क़ के मुतवाज़ी चल रहे हैं
उफ़क़ के मुतवाज़ी चलने-वालों को पार लाती है
वक़्त लहरें—
जिंहें तमन्ना, मगर, समावी ख़िराम की हो
उंही को पाताल ज़म्ज़मों की सदा सुनाती हैं
वक़्त लहरें
उंहीं डुबोती हैं वक़्त लहरें!
तमाम मल्लाह इस सदा से सदा हिरासाँ, सदा गुरीज़ाँ
कि झील में इक उमूद का चोर छुप-के बैठा है
उस के गेसू उफ़क़ की छत से लटक रहे हैं—
पुकारता है: "अब आओ, आओ!
अज़ल से मैं मुंतज़र तुम्हारा—
मैं गुम्बदों के तमाम राज़ों को जानता हूँ
दरख़्त, मीनार, बुर्ज, ज़ीने मिरे ही साथी
मिरे ही मुतवाज़ी चल रहे हैं
मैं हर हवाई जहाज़ का आख़िरी बसीरा
समंदरों पर जहाज़-रानों का मैं किनारा
अब आओ, आओ!
तुम्हारे जैसे कई फ़सानों को मैं ने उन के
अबद के आग़ोश में उतारा—"
तमाम मल्लाह इस की आवाज़ से गुरीज़ाँ
उफ़क़ की शहराह-ए मुब्तज़िल पर तमाम सहमे हुए ख़िरामाँ—
मगर समावी ख़िराम-वाले
जो पस्त‐ओ‐बाला के आस्ताँ पर जमे हुए हैं
उमूद के इस तनाब ही से उतर रहे हैं
इसी को थामे हुए बुलंदी पे चड़ रहे हैं!

इसी तरह मैं भी साथ इन के उतर गया हूँ
और ऐसे साहिल पर आ लगा हूँ
जहाँ ख़ुदा के निशान-ए पा ने पनाह ली है
जहाँ ख़ुदा की ज़ीफ़ आंखें
अभी सलामत बची हुई हैं
यही समावी ख़िराम मेरा नसीब निकला
यही समावी ख़िराम जो मेरी आर्ज़ू था—

मगर नजाने
वो रास्ता क्यों चुना था मैं ने
कि जिस पे ख़ुद से विसाल तक का गुमाँ नहीं है?
वो रास्ता क्यों चुना था मैं ने
जो रुक गया है दिलों के इबहाम के किनारे?
वही किनारा कि जिस के आगे गुमाँ का मुम्किन
जो तू है मैं हूँ!

मगर ये सच है,
मैं तुझ को पाने की (ख़ुद को पाने की) आर्ज़ू में
निकल पड़ा था
उस एक मुम्किन की जुस्तजू में
जो तू है मैं हूँ
मैं ऐसे चेहरे को धूंडता था
जो तू है मैं हूँ
मैं ऐसी तस्वीर के तआक़ुब में घूमता था
जो तू है मैं हूँ!

मैं इस तआक़ुब में
कितने आग़ाज़ गिन चुका हूँ
(मैं उस से डरता हूँ जो ये कहता
है मुझ को अब कोई डर नहीं है)
मैं इस तआक़ुब में कितनी गलयों से
कितने चौकों से,
कितने गूंगे मुजस्सिमों से, गुज़र गया हूँ
मैं इस तआक़ुब में कितने बाग़ों से,
कितनी अंधी शराब रातों से
कितनी बाहों से,
कितनी चाहत के कितने बिफरे समंदरों से
गुज़र गया हूँ
मैं कितनी होश‐ओ‐अमल की शमों से,
कितने ईमाँ के गुंबदों से
गुज़र गया हूँ
मैं इस तआक़ुब में कितने आग़ाज़ कितने अंजाम गिन चुका हूँ—
अब इस तआक़ुब में कोई दर है
न कोई आता हुआ ज़माना
हर एक मंज़िल जो रह गई है
फ़क़त गुज़रता हुआ फ़साना
तमाम रस्ते, तमाम पूछे सवाल, बे-वज़्न हो चुके हैं
जवाब, तारीख़ रूप धारे
बस अपनी तकरार कर रहे हैं—
"जवाब हम हैं—जवाब हम हैं—
हमें यक़ीं है जवाब हम हैं—"
यक़ीं को कैसे यक़ीं से दुहरा रहे हैं कैसे!
मगर वो सब आप अपनी ज़िद हैं
तमाम, जैसे गुमाँ का मुम्किन
जो तू है मैं हूँ!

तमाम कुंदे (तू जानती है)
जो सत्ह-ए दरया पे साथ दरया के तैरते हैं
ये जानते हैं ये हादिसा है,
कि जिस से इन को,
(किसी को) कोई मफ़र नहीं है!
तमाम कुंदे जो सत्ह-ए दरया पे तैरते हैं,
नहंग बन्ना—ये उन की तक़दीर में नहीं है
(नहंग की इब्तिदा में है इक नहंग शामिल
नहंग का दिल नहंग का दिल!)
न उन की तक़दीर में है फिर से दरख़्त बन्ना
(दरख़्त की इब्तिदा में है इक दरख़्त शामिल
दरख़्त का दिल दरख़्त का दिल!)
तमाम कुंदों के सामने बंद वापसी की
तमाम राहें
वो सत्ह-ए दरया पे जब्र-ए दरया से तैरते हैं
अब इन का अंजाम घाट हैं जो
सदा से आग़ोश वा किये हैं
अब इन का अंजाम वो सफ़ीने
अभी नहीं जो सफ़ीना-गर के क़ियास में भी
अब इन का अंजाम
ऐसे औराक़ जिन पे हर्फ़-ए सियह छपेगा
अब इन का अंजाम वो किताबें—
कि जिन के क़ारी नहीं, न होंगे
अब इन का अंजाम ऐसे सूरत-गरों के पर्दे
अभी नहीं जिन के कोई चेहरे
कि उन पे आंसू के रंग उत्रें,
और उन में आयिंदा
उन के रोया के नक़्श भर दे!

ग़रीब कुंदों के सामने बंद वापसी की
तमाम राहें
बक़ा-ए मौहूम के जो रस्ते खुले हैं अब तक
है उन के आगे गुमाँ का मुम्किन—
गुमाँ का मुम्किन, जो तू है मैं हूँ!
जो तू है, मैं हूँ!

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I Too Have Some Dreams: N. M. Rashed and Modernism in Urdu Poetry